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अयोध्या में रामजन्मभूमि का ताला खुलवाने के पीछे कांग्रेस थी या भाजपा? पढ़ें इनसाइड स्टोरी - Ram Mandir babri masjid Doordarshan team reached Ayodhya even before lock was opened

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एक ताले के भीतर अयोध्या की आग दबी हुई थी. ताला खुला और आग भड़क उठी. इस आग ने पहले अयोध्या को जलाना शुरू किया फिर दावानल बनकर पूरे देश में फैल गई. ये आग अपने पीछे एक जलता हुआ सवाल छोड़ गई. अयोध्या में रामजन्मभूमि का ताला खुलवाने के पीछे कांग्रेस थी या भाजपा? राजीव गांधी थे या विश्व हिंदू परिषद्?
ये सवाल आज भी धधक रहा है. ताला कैसे खुला? उसके पीछे कौन लोग थे? और वे कौन लोग थे, जो अब तक सामने नहीं आए हैं? क्या किसी एक गलती से देश का ध्यान हटाने के लिए तब की सरकार ने दूसरी बड़ी गलती की थी? उस रोज क्या हुआ था? यह अब तक तिलिस्म की तरह है. इतने बड़े फैसले की किसी को कानों कान खबर तक नहीं थी.
अगर ताला न खुलता तो विवादित जगह पर शिलान्यास न होता. अगर शिलान्यास न होता तो ढांचा न गिरता. यानी अयोध्या में ध्वंस की जड़ में था विवादित परिसर का ताला खोला जाना. नफा-नुकसान को तौलकर, एक सोची-समझी राजनीति के तहत ताला खुलवाने का फैसला तत्त्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिया था. यह चौंकाने वाला तथ्य है. मगर इतिहास का कड़वा सत्य है.

यह सब क्यों और कैसे हुआ? इसकी भी बड़ी दिलचस्प कथा है. इस एक फैसले ने बंटवारे के बाद देश को एक बार फिर से सांप्रदायिक आधार पर बांट दिया. मजहबी कटुता हमारे भीतर गहरे तक धंस गई. हमने इस दोमुंही राजनीति को नजदीक से देखा. इस एक घटना ने भारतीय राजनीति और समाज को तनाव के उस मुकाम तक पहुंचा दिया, जहां हिंदु और मुसलमान आज भी टकराव के रास्ते पर हैं.
दरअसल, अयोध्या में ताला खुलवाने का फैसला शाहबानो मामले में हाथ जलाने के बाद बहुसंख्यकों को खुश करने का खातिर राजीव गांधी का एक नासमझी भरा पैंतरा था. मुल्ला मौलवियों के सामने घुटने टेकती उनकी सरकार के खिलाफ जो देशव्यापी रोष था, उससे ‘फोकस’ हटाने का सरकार को तब यही रास्ता दिखा. जिसकी तार्किक परिणति अयोध्या ध्वंस के रूप में हुई.
वोटबैंक की तत्त्कालिक राजनीति ने राजीव गांधी से अयोध्या में ताला खुलवा दिया. वे इसके दूरगामी नतीजों से बेखबर थे. इस नाकाम रणनीति से कांग्रेस न इधर की रही न उधर की. मुसलमान ताला खुलने से कांग्रेस से नाराज हुआ. और हिंदू मंदिर बनवाने के लिए भाजपा के पास चला गया. उनके हाथ कुछ नहीं बचा. कांग्रेस आज भी इसी त्रासदी से जूझ रही है.
दूरदर्शन की टीम ताला खुलने की पूरी प्रक्रिया कवर करने के लिए वहां पहले से मौजूद थी. तब दूरदर्शन के अलावा कोई और समाचार चैनल नहीं था. इस कार्रवाई को दूरदर्शन से उसी शाम पूरे देश में दिखाया गया. उस वक्त फैजाबाद में दूरदर्शन का केंद्र नहीं था. कैमरा टीम लखनऊ से गई थी. लखनऊ से फैजाबाद जाने में तीन घंटे लगते हैं. यानी कैमरा टीम पहले से भेजी गई थी.
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा दिल्ली में लिखी गई थी. अयोध्या में तो सिर्फ किरदार थे. इतनी बड़ी योजना फैजाबाद में घट रही थी, पर उत्तर प्रदेश सरकार को इसकी कोई भनक नहीं थी. सिवाय मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह को जिनसे कहा गया था कि वे अयोध्या को लेकर सीधे और सिर्फ अरुण नेहरू के संपर्क में रहें.
मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीरबहादुर सिंह से मेरी इस मुद्दे पर लंबी चर्चा हुई थी. उनके मुताबिक पूरे मामले का संचालन अरुण नेहरू राजीव गांधी के परामर्श से कर रहे थे. हां मुझसे इतना जरूरत कहा गया था कि सरकार अदालत में कोई हलफनामा न दे. लेकिन फैजाबाद के कलेक्टर और पुलिस सुपरिटेंडेंट अदालत में हाजिर होकर यह कहें की अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई एतराज नहीं होगा.
वीरबहादुर सिंह ने बताया कि फैजाबाद के कमिश्नर को दिल्ली से सीधे आदेश आ रहे थे. दिल्ली का कहना था कि इस बात के सारे उपाय किए जाए की ताला खोलने की अर्जी मंजूर हो. और अदालत के फैसले को फौरन लागू करवाया जाए. वरना 37 साल से लटके इस मुद्दे का सिर्फ दो रोज में फैसला हो जाना, वह भी संबंधित पक्षों को सुने बिना, यह मुमकिन नहीं था.
फैजाबाद के जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने ताला खोलने के फैसले का आधार जिला मजिस्ट्रेट आई.पी.पांडेय और एसएसपी करमवीर सिंह की उस मौखिक गवाही को बनाया, जिसमें दोनों ने एक स्वर में कहा था कि ताला खोलने से प्रशासन को कोई एतराज नहीं होगा. न ही उससे कोई कानून व्यवस्था की समस्या पैदा होगी.
इंदु प्रकाश पांडेय बाद में उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) और करमवीर सिंह राज्य के पुलिस महानिदेशक बने. यानि दोनो ही अपने-अपने महकमे के शीर्ष तक पहुंचे. इतनी विपरीत स्थितियों में जिला प्रशासन का यह रुख बिना शासन की मर्जी से तो नहीं हो सकता था. खास बात यह थी कि जिन उमेश चंद्र पांडेय की अर्जी पर ताला खुला. वह बाबरी मुकदमे के पक्षकार भी नहीं थे. और जो पक्षकार थे उन्हे जज साहब ने सुना ही नहीं. उनकी दरखास्त के बावजूद.
असल में राम जन्मभूमि पर ताला किस के आदेश से कब और क्यों लगाया गया? यह किसी को पता नहीं था. ऐसा कहीं कोई आदेश भी नहीं मिलता है. स्थानीय लोग कहते हैं ताला तो 1971 में लगा. 1949 में तो किसी ने भी ताला नहीं लगाया था. पूरे मामले का कानूनी पहलू यह था कि यह जगह एक ‘रिसीवर’ के अधिकार में आती है. 1949 में ही अदालत ने इस संपत्ति को कुर्क करके फैजाबाद के प्रियादत्त राम को ‘रिसीवर’ बना दिया था.
रामलला का भोजन राम चबूतरे की रसोई में बनाया जाता था. इसके बाद भोग लगाने के लिए संतरी विवादित इमारत का ताला खोल देता था. 1971 में रिसीवर प्रियादत्त राम की मृत्यु हो गई. तब नए रिसीवर और निर्मोही अखाड़े के बीच विवाद खड़ा हो गया. किन्हीं दो पक्षों के बीच संपत्ति को लेकर कानूनी विवाद अदालत रिसीवर नियुक्त करती है. यह रिसीवर विवाद के निपटारे तक संपत्ति की देखभाल करता है.
इस पर पुलिस ने दखल दिया और ताला लगाकर चाबी अपने पास रख ली. मौके पर तैनात संतरी बदल गया और चाबी नए संतरी को सौंप दी गई. वहां दो दरवाजे थे. एक दरवाजा भोग लगाने और प्रार्थनाओं के लिए हमेशा खुला रहता था. लंबे समय तक यही व्यवस्था चलती रही. यानी, कुल मिलाकर यह जगह पूरी तरह कभी ताले में बंद ही नहीं थी.

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